क्या बतलाऊँ राम

 
  हाल मैं क्या बतलाऊँ राम
जनजीवन भी अस्त व्यस्त हैं
रुके पड़े हैं काम

विपदा आन पड़ी है भारी
राम करो उपकार
कोरोना रूपी रावण का
कर भी दो संहार
निज मन की है विनती तुमसे
यही सुबह से शाम

गौतम नार अहिल्या तारे
फूँक शिला में प्राण
हाहाकार मचा धरती पर
राम चलाओ बाण
फिर से लो अवतार धरा पर
सीता भी हो बाम

मिल जाये जो मुझको प्रभुवर
तव चरणों की धूल
तो जीवन की बगिया में फिर
खिल जाएंगे फूल
बन जाये मन के मंदिर में
राम तुम्हारा धाम

तुमसे बढकर नाम तुम्हारा
देता है आनन्द
लिखने लगता है व्याकुल मन
निर्मल पावन छंद
आशंकाएं मिट जाती हैं
मिल जाता आराम
हाल मैं क्या बतलाऊँ राम

- रमा प्रवीर वर्मा
१ अप्रैल २०२०

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