करती नदियाँ शोर (दोहे)

वर्षा मंगल
 

सावन में कल कल बहे, करती नदियाँ शोर
मानव मन यों झूमता, नाचे तट पर मोर

झरने भी झर झर बहें, कानन गूँजे शोर
अँगड़ाई ले कामिनी, ज्यूँ पतंग बिनु डोर

जल भर कर बादल चले, भई घटा घनघोर
दमकत ऐसे दामिनी, हुई रात ही भोर

धरती पर यों छा गयी, हरियाली चहुँ ओर
पुलकित मानव मन भरे, झूमत झूम हिलोर

बगियन में झूले पड़े, लम्बी लम्बी डोर
सखियाँ झूलें संग में, धरे साँवरे छोर

-अशोक रक्ताले
३० जुलाई २०१२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter