वसंती हवा

बहार
दिव्या माथुर

 
पेड़ों की
शीतल छाँव तले
यौवन था
जहाँ भी पाँव पड़े
अल्हड़ कलियाँ
यों शरमाईं
घूंघट में छिपा लिए चेहरे

भँवरे थे फूलों को घेरे
तितलियाँ लगातीं
सौ फेरे

कल कल करता
ठंडा पानी
कू कू करती
कोयल रानी

पपीहे ने पुकारा
मचा शोर
होकर विभोर
नाच उठे मोर

छा गई घटा
मनचली भली
लाल सुनहरी
साँझ ढली

लो आज गई
तन मन बुहार
झीनी भीनी-सी
इक फुहार

फूलों से लदे
एक झूले में
लो सजी धजी
आई बहार

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