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''उड़े मेघा बने अबीर-गुलाल
बरसे उन्माद फुहार-फुहार. . .
रंग पुष्पित निहार आज पंख-पंख
फाल्गुनी भी जैसे बहार-वसंत
राग-द्वेष हुए आज भंग-भंग
सब देश हुए आज संग-संग
'वृद्ध-तरुण-बाल' बने आज छंद-छंद
पीयें होली के रस संग भंग-भंग
सारे गाएँ-बजाएँ साज राग-वृंद
जग होए हुड़दंग बाजे सबरस मृदंग
हर्षित मन आज पुलकित सब जन
छाए अंग-अंग आज सत्संग-तरंग
'होरि' ब्रज-सी उमड़े आज अनंत-रंग
वह हो लिया, . . .वह हो ली
'सहचरी' बन प्रफुल्लित दल संग-संग
अंतःकरण से
सरे आम
'सररर-सररर' की गूँज लिए!''