वसंती हवा

बसंत
दिव्या माथुर

 

स्वर्णिम धूप हरा मैदान
पीली सरसों हुई जवान
चुस्त हुआ रंगों में नहा
लो देखो वयस्क हुआ उद्यान

झील में हैं कुछ श्वेत कमल
या बादल नभ पर रहे टहल
मृदुगान से कोयल के मोहित
हैं नाच रहे मोरों के दल

यों पवन की छेड़ाछाड़ी से
उद्विग्न हैं कलियाँ
फूलों का पा संरक्षण
निश्चिंत हैं कलियाँ

फूलों से चहुँ ओर घिरे
भौंरे जैसे मदपान किए
ख़याल तेरा भी भंग पिए
आया बसंत को संग लिए

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