वसंती हवा

गिरगिट
श्यामल सुमन

 

1
होली हम भी मनाते हैं
और हमारे रहनुमा भी मनाते हैं।
लेकिन दोनों के होली में फ़र्क है
जिसके लिए प्रस्तुत यह तर्क है।।

सब जानते हैं
कि होली रंगों का त्योहार है।
एक दूसरे के चेहरे पर
रंग लगाने का व्यवहार है।
रंगों में असली चेहरा
कुछ देर के लिए छुप जाता है।
पर अफ़सोस ऐसा दिन हमारे लिए
साल में बस एकबार ही आता है।।

लेकिन हमारे रहनुमा
पूरे साल होली मनाते हैं।
बिना रंग लगाए सिर्फ़ रंग बदलकर
अपना असली चेहरा छुपाते हैं।।

देखकर इन रहनुमाओं की
रंग बदलने की रफ़्तार।
गिरगिटों में छाई बेकारी
और वे करने लगे आत्महत्या लगातार।।

1 मार्च 2007

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।