वसंती हवा

जब बसंत ऋतु जागी
सावित्री तिवारी 'आज़मी'

 

1
काँधे तक कंबल सरका कर, सर-से सर्दी भागी
तब थोड़ी-सी राहत आई जब बसंत ऋतु जागी

सूरज करने लगा ठिठोली, लगा ठहरने ज़्यादा
चंदा घर जल्दी जाने की, लांघ रहा मर्यादा

तारों ने भी शुक्र मनाया, घटी जो पहरेदारी
खींचा-तानी में दिन जीता, रात बेचारी हारी

पीले-पीले फूल खिले, सरसों ने ली अंगड़ाई
हल-चल भई बाग के भीतर, अमवा भी बौराई

फागुन खड़ा द्वार के बाहर, राग मल्हार अलापे
कोयल पपिहा बेर-बेर, घर आँगन, झाँके-ताके

गोरी का मनवा अति हर्षित, मन ही मन मुसकाए
जो घर साँवरिया आ जाए, मन मुराद मिल जाए

कहे आज़मी मैं भी अपने दिल का हाल सुनाऊँ
जो बसंत पर पिय माने तो, पीहर तक हो आऊँ

११ फरवरी २००८

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।