वसंती हवा

काश मिलो तुम भी
सुमन कुमार घई  

 

काश मिलो तुम भी
इसी राह पर
किसी मोड़ के बाद
जैसे उदास शिशिर के बाद
वसंत ऋतु आए

विरह की सर्द रातों के बाद
मिलन की फिर
हल्की-सी गर्माहट हो
तुम्हारे चेहरे पर देखूँ
फिर से एक, खिली-सी धूप
बिल्कुल वसंत की तरह

तुम्हारे फूल से होंठो को
देखता रहूँ, ठिठका हुआ
ले मीठे से स्वप्न, आँखों में
मंडराते भँवरे की तरह
वासंती फूलों के आस पास

अभी तक दिल मे बसी है
सुनहली हरी चूड़ियों की खनखनाहट
धानी चुनरी पर छिटकी
पीली सरसों-सी
वो सरसराहट--
जैसे
इठलाती वासंती पवन
पकती गेहूँ के खेतों से गुज़र जाए

काश मिलो तुम भी
इसी राह पर
किसी मोड़ के बाद
अपनी इच्छाओं के
तिनके समेटता हूँ
इस ऋतु के परिंदों की तरह
प्रतीक्षित हूँ
मिलो कभी और अगर हो सके
मेरे साथ चलो
ज़िंदगी के अगले मोड़ तक
कुछ इच्छाएँ, कुछ आशाएँ
जागती हैं
ठूँठ मे फूटती
वासंती कोंपलों की तरह
काश---

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