वसंती हवा

धरती के इस क्षणिक कंप से
ज्ञानराज माणिकप्रभु

 

वसंत ऋतु के आने से पहले ही उपवन नष्ट हुआ है
धरती के इस क्षणिक कंप से, मानव का मद ध्वस्त हुआ है।

महाप्रलय की पूर्व-सूचना है यह धरती डोल रही है।
सर्वनाश की दुंदुभि भू के अंतस्तल से बोल रही है ।
तांडव के नर्तक का पद-विन्यास आज सुपष्ट हुआ है।
धरती के इस क्षणिक कंप से मानव का मद ध्वस्त हुआ है।
कल तक जिस घर में, आँगन में निर्भय होकर मैं रहता था।
कल तक जिस भ्रम को, सपने को, नि:संशय अपना कहता था।
आज उसी को अस्त-व्यस्त सा देख हृदय संत्रस्त हुआ है
धरती के इस क्षणिक कंप से मानव का मद ध्वस्त हुआ है।

पनघट पर मरघट की छाया आज यहाँ पर व्याप रही है।
नटखट बच्चों के प्रेतों को देख मृत्यु भी काँप रही है।
उगने से पहले ही सूरज आज यहाँ का अस्त हुआ है।
धरती के इस क्षणिक कंप से मानव का मद ध्वस्त हुआ है।

भूमिसात कितने घर, कितनी गलियाँ, कितने ग्राम हुए हैं।
भस्मसात इस एक चिता पर कई रूप औ' नाम हुए हैं ।
चिता धूम की कालिख से नभमंडल सारा ग्रस्त हुआ है।
धरती के इस क्षणिक कंप से मानव का मद ध्वस्त हुआ है।

यहाँ सहस्त्रों शव बिखरे हैं, इनमें कुछ मेरे अपने हैं।
इन मलबों के साथ शवों के दफन हुए मेरे सपने हैं।
एक अकेला दुखी नहीं मैं, विश्व शोक संतप्त हुआ है।
धरती के इस क्षणिक कंप से मानव का मद ध्वस्त हुआ है।

विधवाओं की करुण पुकारें आज गगन को चीर रही हैं।
भूखे शिशुओं को समझाने अन्न, नीर या क्षीर नहीं है।
वृद्धों की जीवन संध्या का दीप तिमिर संपृक्त हुआ है।
धरती के इस क्षणिक कंप से मानव का मद ध्वस्त हुआ है।

'घायल की गाति घायल जाने' सत्य सिद्ध यह उक्ति हुई है।
नहीं एक भी देह यहाँ पर जिसकी वृण से मुक्ति हुई है।
आज यहाँ धरती का आँचल तप्त रक्त से सिक्त हुआ है।
धरती के इस क्षणिक कंप से मानव का मद ध्वस्त हुआ है।

मानव का मद ध्वस्त हुआ, पर मानवता चिर औ' शाश्वत है।
मानव के प्रति हर मानव का प्रेमभाव अब भी जाग्रत है।
पुनर्वास की देख प्रक्रिया 'ज्ञान' हृदय आश्वस्त हुआ है।
धरती के इस क्षणिक कंप से मानव का मद ध्वस्त हुआ है।

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