वसंती हवा

फागुन हँसता
--डॉ. गोपालबाबू शर्मा

 

फागुन हँसता, झूमता, लिए हाथ में चंग।
मन के भीतर छिड़ गई, एक अनोखी जंग।।

सरसों फूली हौस में, भौंरे गाते गान।
टेसू रागों में रंगे, चले काम के बान।।

प्रकृति नई दुल्हन बनी, हुए रंगोली खेत।
भीगी मीठे प्यार से, पगडंडी की रेत।।

बदरा से चारों तरफ़, उड़े अबीर-गुलाल।
पग-पग पर बिखरे दिखें, रंग-बिरंगे ताल।।

आँगन में झाँझर मुखर, चौपालों पर गीत।
भाव-जगे सपने जगे, मन में उमड़ी प्रीत।।

नयना मतवारे भए, मन में दहकी आग।
फागुन आया प्रिय नहीं, कैसे खेलें फाग।।

किसने मला गुलाल मुख, किसने डाला रंग।
गोरी को सुध-बुध कहाँ, मन यादों के संग।।

हिल-मिल होली खेलिए, मन का आपा खोय।
कल की है किसको खबर, कौन कहाँ पर होय।।

११ फरवरी २००८

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।