वसंती हवा

फगुनाया-सा मन
उषा चौधरी 

 

गुनगुनी धूप में फगुनाया-सा मन
राहें ले जा रहीं कहाँ ये थके चरन।

बर्फ़ीली घाटियों में गूँजती हैं ध्वनियाँ
इठलाता गाता पवन गुंजित हैं गलियाँ।
अमराई बौराई बौराया-सा मन
राहें ले जा रहीं कहाँ ये थके चरन।

बहती नदी के टूट गए तट-बंध
बंधन में बँधे कहाँ मन के संबंध।
प्रेम की त्रिवेणी में नहलाया-सा मन
राहें ले जा रहीं कहाँ ये थके चरन।

जीवन में चलना है चलते ही जाना
प्राणों की छलना में छलते है जाना।
स्वप्न और सत्य में उलझाया-सा मन
राहें ले जा रहीं कहाँ ये थके चरन।

चिंतन के अंतरिक्ष दूर-दूर फैले
भीड़ भरे चौराहे फिर भी अकेले।
सागर के तल में ठहराया-सा मन
राहें ले जा रहीं कहाँ ये थके चरन।

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