वसंती हवा

बसन्ती बही फिर हवा
- राकेश खंडेलवाल 

 


बन दुल्हन सज गईं धान की बालियाँ
स्वर्ण गोटे के परिधान को ओढ़ कर
हाथ सरसों के पीले किये खेत ने
ताल की सीढ़ियाँ गीत गाने लगीं
पाग पीली धरे शीश टेसू हँसे
और चंचल घटा लड़खड़ाने लगी

पत्तियों पे रजत मुद्रिका-सी सजी
ओस की बूँद कुछ हो गई चुलबुली
राह पनघट की जागी उठी नींद से
ले उबासी, खड़ी आँख मलती हुई
भोर दे फूँक उनको बुझाने लगी
रात की ढिबरियाँ जो थीं जलती हुई

थाल पूजाओं के मंदिरों को चले
स्वर सजे आरती के नये राग में
गंध की तितलियाँ नृत्य करने लगीं
शाख पर उग रही स्वर्ण-सी आग में
रंग लेकर बसन्ती बही फिर हवा
बालियाँ कोंपलें गोद उसकी झुलीं

कंबलों को हटा लेके अंगड़ाइयाँ
धूप ने पाँव अपने पसारे जरा
खोल परदा सलेटी, क्षितिज ने नया
रंग ला आसमानी गगन में भरा
डोर की शह मिली तो पतंगें उड़ीं
और सीमाएँ अपनी बढ़ाने लगीं

९ फरवरी २००९

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