वसंती हवा

ऋतुराज आ गया
-अज्ञेय 

 

 

शिशिर ने पहन लिया वसंत का दुकूल
गंध बन उड़ रहा पराग धूल झूल
काँटे का किरीट धारे बने देवदूत
पीत वसन दमक उठे तिरस्कृत बबूल
अरे! ऋतुराज आ गया।

२४ मार्च २००५

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