वसंती हवा

वासंती धूप
कृष्णा नंद कृष्ण

 

1
बिखर गई
आँगन में
वासंती धूप।

बौराई मधुगंधी
रसवंती अमराई
थाहे को नीलवरण
आँखों की गहराई
यादों के
दरपन में
छितराया रूप।

गदराई धरती का
पोर-पोर झूमा
बरजोरी भौंरों ने
कलियों को चूमा
सरसों की पियरी में
शरमाया रूप।

इन क्वांरी गलियों को
छेड़ रहा पछुआ
फेंक गया जाल फिर
कामदेव मछुआ
छटपटाती
देख रही
दीवारें चुप।

1 मार्च 2007

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