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२६. १. २००९

अंजुमन । उपहार । काव्य संगम । गीत । गौरव ग्राम । गौरवग्रंथ । दोहे । पुराने अंक । संकलन । हाइकु
अभिव्यक्ति । हास्य व्यंग्य । क्षणिकाएँ । दिशांतर

नागफनियाँ मुस्कान में

  औपचारिक
बन गए प्यार के रिश्ते।

नागफनियाँ
उग रही मुस्कान में,
नाचते हैं
प्रेत ज्यों श्मशान में,

मौन तीखा
बँध गए मनुहार के बस्ते।

मूल से उखड़े
नहीं कोई चुभन,
स्वयं से झगड़े
नहीं कोई जलन,

बन गए
नासूर ही, अब घाव से रिसते।

देह पर
पहने वसन हैं पीर के,
किस तरह
मन को दिखाएँ चीर के,

बोले मीठे भी
ह्रदय में फाँस से चुभते।

--दिवाकर वर्मा

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गीतों में-
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पुनर्पाठ में-
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प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
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-|- सहयोग : दीपिका जोशी
 
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