अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

ओंठों पर मुस्कान
 
 
कितनी मोहक लग रही रंगों सजी दूकान।
कर में कोमल पुष्प हैं, अधरों पर मुस्कान।

देखो इनके हाँथ में, तरह तरह के फूल।
तुम भी अब हँस दो ज़रा, सारे गम को भूल।।

शायद कुछ तो कह रहे, तनिक इसे भी जान।
पढ़ पढ़कर बतला मुझे, नयनों का विज्ञान।।

इनसे भी कुछ सीख लो, हरदम हँसते फूल।
अगल बगल रहते सदा, जबकि केवल शूल।।

भाँति भाँति के पुष्प हैं, कितना मोहक चित्र।
अब विलंब क्यों कर रहे, फ़ोटो खींचो मित्र।।

उसे देख बढ़ने लगा, मेरे उर का शोर।
रोके से रुकता नहीं, नाचा मन का मोर।।

- राम शिरोमणि पाठक
१ जून २०१८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter