अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

ओंठों पर मुस्कान
 
 
सुन्दर फूलों सी खिली, ओंठों पर मुस्कान।
मन में छवियाँ प्रीत की, मत बनना अंजान।
मत बनना अंजान, बात अधरों पर आए।
आँखों के मधु जाम, देखिए छलके जाए।
रंग बिरंगे पुष्प, पुष्प के साथ भली सी।
मन्द मन्द मुस्कान, खिले सुन्दर फूलों सी।


खूब फैलता जा रहा, फूलों का व्यापार।
किन्तु कृत्रिम हो रहा, प्रेम और व्यवहार।
प्रेम और व्यवहार, अर्थ है इन पर भारी।
सभी उलझनों बीच, मुख्य पात्र बनी नारी।
बात यही है सत्य, हँसी में है कृत्रिमता।
फिर भी यह बाजार, जा रहा खूब फैलता।


सबके मन भाते बहुत, रंग बिरंगे फूल।
किंतु इनके साथ ही, रहते भी हैं शूल।
रहते भी हैं शूल, स्मरण रखना है सबको।
इसीलिए कुछ दूर, चाहिए रखना इनको।
बात यही है सत्य, निकट आते मुस्काते।
जादू करे कमाल, तभी सबके मन भाते।

- सुरेन्द्रपाल वैद्य
१ जून २०१८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter