अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

ओंठों पर मुस्कान
 
 
दिल में आँसू के सागर हैं
ओंठों पर मुस्कान धरी है

सबसे आगे
हो जाने की
बस जीवन में होड़ मची है
सुबह शाम के सोपानों ने
टेढ़ी मेढ़ी कथा रची है

काँटों पर बैठे फूलों के
चेहरों पर उजास बिखरी है

कोलाहल है
जगर मगर है
भीड़ भाड़ है यहाँ शहर में
दो जोड़ी बूढ़ी आँखों में
खालीपन पसरा है घर में

आशंकाओं की साँसों में
अन्दर तक उम्मीद भरी है

मगर हो सके
तो सचमुच में
तन से मन से तुम खुश रहना
दुख की धूप तेज होगी, पर
उसको भी तुम हँस कर सहना

पैरों में बबूल के कांटे?
देखो आगे मौलसिरी है

- डॉ. प्रदीप शुक्ल
१ जून २०१८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter