अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 


यू एस ए से डॉ. अमिता तिवारी की क्षणिकाएँ

 

  युद्ध के विरुद्ध हूँ मैं                                    
 
(एक)
युद्ध  में न हारा देश हारता है
युद्ध  में न जीता  देश जीतता है
युद्ध  तो केवल शहीदों के         
घरवालों पर बीतता है
 
(दो)
जिन जिन पर युद्ध बीत गया
हरा भरा घर रीत गया
क्या फ़रक पड़ता अब उनको
कौन देश अब हार गया
कौन देश अब जीत गया

(तीन)
सीमा पर युद्ध न हारे जाते हैं
न सीमा के लिए जीते जाते हैं
 राजधानी में जो घोषणाएँ चीखते  हैं
वो तो केवल
शहीदों की चिताओं पर लगने वाले मेलों में जाते हैं


(चार)
कोई युद्ध अचानक सीमा पर पैदा नहीं हो जाता
उसके पीछे एक पूरा तंत्र होता है
 हर किसी को कुछ न कुछ मिल जाता  है
बस शहीदों के साथ ही षडयंत्र होता है । 

1 दिसंबर 2007

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।