|
घुट रहा है दम
घुट रहा है दम
भर गई है फेफड़ों में
जलन की झुलसाती महक
पत्ते अब हिलते नहीं
शहर में बस सड़कें हैं
तने हैं खम्बे बिजली के
सब धुन्धला है।
अनुलोम विलोम
नहीं कुछ होगा
कठिन है पैदा होना
नया जीवन।
पाना होगा छुटकारा
भीतरी और बाहरी
अशुद्धियों से
इतना तो कर ही लो।
४
मई २००९
|