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हमारे रिश्तों के बीच
हमारे रिश्तों के बीच
कहाँ से आ गया आदर
खो गया कहीं
जो मेरा अपना था।
मुहब्बत को लग गया ग्रहण
बात अब डर की हो गई है
राधा का जिससे था रिश्ता
वो कहीं खो गई है।
इन्तज़ार अब नहीं रहता
बजेगी घन्टी फ़ोन की
चैट भी हो गई है अस्वाद
रिश्तों की गरमाहट
ठंडी हो गई है।
ठंडापन पसर गया है
सर्द हवाओं ने घेरा है
रिश्ते हो गए हैं नम
भावनाओं ने ओढ़ ली है चादर।
इश्क और प्यार अब
महसूस नहीं होते हैं
गर्मजोशी बची नहीं है
और बन गया हूँ मैं
पर्याय ग़लतियों का।
४ मई २००९
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