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प्रभु त्रिवेदी के दोहे

 

 

सूरज की पहली किरण

सूरज की पहली किरण भरती मन उल्लास
कली बदलती फूल में जीवन का विश्वास

दिन भर बाँटे रोशनी खुद जलकर दे दान
सुबह सलोनी के लिए डूब मरे दिनमान

स्वर्ण कटोरा हाथ में ले निकला दिनमान
दिशा दिशा सुख बाँटता यही महा अभियान

नहीं समझ में आ रहा अपना यह आयाम
सूरज क्यों छुपता फिरे देख सुनहरी शाम

घोर अंधेरी रात के सूरज है उस पार
मिटकर ही तू पाएगा जीवन-धन उपहार

रीति जगत की है यही पड़ता है जब काम
उगते सूरज को सभी करते सदा प्रणाम

जग को दर्शन दे रहा सुबह सुबह एक रूप
भेद भाव को भूलकर वितरित करता धूप

आलोकित आकाश में एक मात्र भगवान
पागल सूरज रूप में करते हैं पहचान

१५ सितंबर २००८

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