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दो गीत- वेद प्रकाश शर्मा वेद

 

 

  जय गाथा

दसों दिशा में अनुनादित हूँ!

महिमा-मंडित पाखंडों से
कृष्ण-भुजंगी हथकंडों से
राजस तावीज़ों गंडों से
सत्ता-सीढ़ी के डंडों से

हाथ मिलाकर
साथ निभाकर
प्रासादों तक सम्मानित हूँ!

घोर गिरगिटी आवरणों को
और सियारी आचरणों को
मारिची-सीता-हरणों को
श्रीपथ-अनुगामी चरणों को

शीश नवाकर
मीत बनाकर
उच्च-शिखर पर शोभान्वित हूँ!

शब्दों का व्यापार बनाकर
गीतों का बाज़ार सजाकर
सुर-लय में आवाज़ लगाकर
गीत मौसमी रंग के गाकर

भीड़ जुटाकर
मन बहलाकर
कीर्ति-गान में अनुवादित हूँ!

 

विडंबना

अब जब सूरज डूब रहा है
मुझे जगाने आए हो
अनुबंधों को संबंधों की
रीति सिखाने आए हो!

नाग-पंचमी त्योहारों को
कारोबार बनाया पहले
पाल-पोसकर फुंकारों को
देशों तक पहुँचाया पहले

काया नीली पड़ी हुई अब
मंत्र-दवा सब व्यर्थ हुए,
नागयज्ञ तब, हे जनमेजय
यहाँ रचाने आए हो!

कीड़ा का अथ लेकर पांसे
इति में चीर-हरण तर पहुँचे
नीती, पराक्रम बँधे राज्य से
जीवित मृत्यु-वरण तक पहुँचे

कलुष, कुटिलता कुरुक्षेत्र में
कुल-अंकुर जब ले आई
तब गीत का ज्ञान, कृष्ण
तुम हमें कराने आए हो!

कैकयी के मलिन मौन में
मुखरित हुए मंथराई स्वर
राजा उपकृत और पुरस्कृत
करते, रानी को देकर वर

राम रूप में पितु-आज्ञा से
मर्यादा वनवासित है,
राजभवन तब कोपभवन से
मुक्त कराने आए हो!

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