अंजुमन उपहार । कविकाव्य चर्चा काव्य संगम किशोर कोना गौरव ग्राम
गौरवग्रंथ
दोहे रचनाएँ भेजें नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन
हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

 


गोविंद नारायण मिश्र
के हाइकु

 

 

हाइकु

नीम की छाँह
धूप के संग चली
पकडे बाँह।

नेह उलीचे
सागर से अंबर
धरती सींचे।

गंगा निर्मल
बहती अविरल
पीती गरल।

ढूँढ़ती छाँव
चिलचिलाती धूप
शीतल छाँव।

रवि का स्पर्श
रात कुनमुनायी
भरी अलस।

रश्मि ललाम
सूरज का प्रणाम
धरा के नाम।

नदी कुँवारी
डूब मरी बेचारी
पाँव थे भारी।

16 जनवरी 2007

 

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। कविकाव्य चर्चा काव्य संगम किशोर कोना गौरव ग्राम गौरवग्रंथ दोहे रचनाएँ भेजें
नई हवा
पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।