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अरविंद कुमार झा

 

गर्मी की कुंडलियाँ

गर्मी का यह हाल है बिजली पानी बंद
ये सब छोटी बात है हम सब है स्वच्छंद
हम सब हैं स्वच्छंद नस्ल है कुछ की घटिया
बिजली बिल से मुक्ति फँसाए रहना कटिया
मिनरल वाटर खींच करे जब नल हठधर्मी
जेबें हल्की होंय स्वयं मिट जाए गर्मी

गर्मी क्षेत्र-विकास की जब जब पकड़े जोर
आए पास चुनाव तब करें विधायक शोर
करें विधायक शोर जोड़ हाथों को बोलें
तू मेरी दे पोल खोल हम तेरी खोलें
फिर उतरें मैदान एक से एक कुकर्मी
जब हो पास चुनाव बढ़े तब तब सरगर्मी

गर्मी जब सिर पर चढ़ी दे मूछों पर ताव
दिन में तारे दिख रहे तन पर जले अलाव
तन पर जले अलाव हवा भी खिसक गई है
हुई ज़िंदगी नर्क देह अब चिपक रही है
तभी कहें अरविंद कि जब जब बढ़े अधर्मी
बस तब तब भगवान बढ़ाते रहते गर्मी

गर्मी की सौगात है ककड़ी खीरा आम
फ्रिज कूलर पंखे चले जिसमें झाम तमाम
जिसमें झाम तमाम करो बिजली की पूजा
जब ये खेले खेल रहे मुँह सबका सूजा
अर्धनग्न 'अरविंद' छोड़ करके बेशर्मी
किए बिना कुछ काम पसीना देती गर्मी

गर्मी भारी पड़ रही मुख पर आया स्वेद
सारा मेकअप धुल गया उन्हें हुआ यह खेद
उन्हें हुआ यह खेद कि विपदा बड़ी विकट है
कहता है विज्ञान सूर्य आ रहा निकट है
ऐसा कर भगवान दिखे मौसम में नर्मी
वर्ना तो सब लोग भयंकर झेलो गर्मी

६ जुलाई २००९

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