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डॉ. गणेशदत्त सारस्वत
की कुंडलियाँ

 

  चुनावी कुडलियाँ

अपने मतलब के लिए चले अनेकों दाँव।
हट्टे-कट्टे भेजकर, लूटे कितने गाँव।
लूटे कितने गाँव, शहर भी नहीं बच सके।
आँसू विचलित नहीं किसी के कभी कर सके।
'आयोगी कोड़े' ने तोड़े सारे सपने।
दोष किसे दें जब न रहे अपने ही अपने।

२

आयोगी आतंक से नेताजी हैं त्रस्त।
रखे असलहे रह गए, वोटर फिरते मस्त।
वोटर फिरते मस्त, बोलते उसकी जय-जय।
जिसके कारण घूम रहे वे होकर निर्भय।
सपने में भी कभी न सोचा यह गति होगी।
ऐसी की तैसी कर देगा तंत्रायोगी।

३

करवाए दंगे बहुत, बहुत किए उत्पात
तोड़-फोड़ के साथ ही ईटों की बरसात।
ईटों की बरसात, न चूके राहजनी से
लड़वाया रहमत उल्ला को रामधनी से।
गृद्ध दृष्टि से नहीं तंत्र की पर बच पाए
करना ही स्वीकार पड़ा-दंगे करवाए।

४

नहीं गड़बड़ी है कहीं, नहीं कहीं भी भ्रांति
नारेबाजी है नहीं, व्याप्त चतुर्दिक शांति।
व्याप्त चतुर्दिक शांति नहीं है शोर-शराबा
ऐसा कसा शिकंजा, गायब खून-खराबा।
सब कुछ है सामान्य नहीं है कहीं हड़बड़ी
यह भी भला चुनाव कहीं भी नहीं गड़बड़ी।

५

कल तक थे जो मंच पर खड़े एक ही साथ
आज उन्होंने है लिया थाम 'हाथ' का हाथ।
थाम 'हाथ' का हाथ, 'साइकिल' पर हैं नज़रें
'हाथी' से रिश्ते की आती छन-छन खबरें।
यारी इनकी रही 'कमल' से भी है बेशक
पहना करते थे 'काली टोपी' ही कल तक।

६

उससे-इससे कह रहे, नेताजी यह बात
'कुर्सी' को दी प्रमुखता, दल पर मारी लात।
दल पर मारी लात, न देरी की पल भर की
निष्ठा की है बात व्यर्थ, वह चेरी घर की।
आज इधर, कल उधर, फ़र्क पड़ता क्या इससे
गदहा भी है बाप, काम बनता यदि उससे।

७

बदले इस माहौल में हुई योजना फेल
जिन 'अपनों' पर नाज़ था, पहुँच गए वे जेल।
पहुँच गए वे जेल, लगी यों गहरी ठोकर
'बूथ कैप्चरिंग स्वप्न, हुआ सारा गुड़-गोबर।
हथकंडे रह गए, धरे के धरे रुपहले
कैसे क्या कुछ करें कि जिससे किस्मत बदले।

८

जब भी हैं ये बोलते, झड़ते मुँह से फूल
कर्म किंतु इनके नहीं वचनों के अनुकूल।
वचनों के अनुकूल कभी भी नहीं चले हैं
जाने किस साँचे में ये श्रीमान ढले हैं।
इनके लिए बहुत ही कम धन अरब-खरब भी
निरे दूध के धोए लगते, मिलते जब भी।

९

आए हैं श्रीमान जी, बहुत दिनों के बाद
जाने कैसे आ गई, इन्हें हमारी याद।
इन्हें हमारी याद तभी आती है भैया
जब चुनाव की डगमग-डगमग होती नैया।
कोरे वादों का बोझा ढोकर लाए हैं,
इतने वर्षों बाद कृपा की, जो आए हैं।

१०

भैयाजी करते रहे, कल तक कफन खसोट
आज वही हैं द्वार पर आए लेने वोट।
आए लेने वोट, कर रहे पाँय-पलोटी
देने को तैयार खड़े हैं रकमें मोटी।
'पाउच' दे कह रहे कि पार लगाओ नैया
फँसी बीच मँझधार, उबारो वोटर भैया!

११

निर्वाचन आयोग को साधुवाद शतबार
आशंकाओं से लिया उसने हमें उबार।
उसने हमें उबार, नया विश्वास जगाया
पारदर्शिता का नूतन इतिहास बनाया।
नज़रबंद वे सभी कि जिनका मैला दामन
नहीं असंभव कुछ भी, साक्षी है निर्वाचन।

१५ दिसंबर २००८

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