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हुल्लड़ मुरादाबादी


नाम: सुशील कुमार चड्ढा। १९६४ से हिन्दी काव्य मंच पर प्रतिष्ठित। काकाहाथरसी पुरस्कार तथा हास्य रत्न की उपाधि से विभूषित।

प्रकाशित पुस्तकें : 'तथाकथित भगवानों के नाम',  'हुल्ल्ड के कहकहे', 'हज्जाम की हजामत', 'हुल्लड की हरकतें', 'हुल्लड की श्रेष्ठ हास्य व्यंग रचनायें' एवं काव्य पाठ।

विदेश यात्रायें : बैंकाक, नेपाल, हांगकांग तथा अमेरिका के १८ नगरों में। एच. एम. वी. द्वारा एक एल.पी. रिकार्ड चार झ. पी. ऱिकार्ड तथा दो कैसेटस तथा सुपर कैसेट्स टी सीरीज़ द्वारा आडियो कैसेटस ''हुल्लड झ्न हांगकांग'' रिलीज हो चुका है।

फिल्म :'संतोष तथा बंधनबांहों का' में अंभिनय।

विशेष : भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ० शकर दयाल शर्मा द्वारा मार्च १९९४ में अभिनन्दन राष्ट्रपति भवन में।

  पुरानी शायरी नये संदर्भ (पैरोडियाँ)

अभी तो मैं जवान हूँ
ज़िन्दगी़ में मिल गया कुरसियों का प्यार है
अब तो पाँच साल तक बहार ही बहार है
कब्र में है पाँव पर
फिर भी पहलवान हूँ
अभी तो मैं जवान हूँ।

मुझसे पहली-सी मुहब्बत
सोयी है तक़दीर ही जब पीकर के भांग
महँगाई की मार से टूट गई है टाँग
तुझे फोन अब नहीं करूँगा
पी.सी.ओ. से हांगकांग
मुझसे पहले सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग।

ऐ इश्क मुझे बरबाद न कर
तू पहले ही है पिटा हुआ ऊपर से दिल नाशाद न कर
जो गई ज़मानत जाने दे वह जेल के दिन अब याद न कर
तू रात फोन पर डेढ़ बजे विस्की रम की फरियाद न कर
तेरी लुटिया तो डूब चुकी ऐ इश्क मुझे बरबाद न कर

जब लाद चलेगा बंजारा
इक चपरासी को साहब ने कुछ ख़ास तरह से फटकारा
औकात न भूलो तुम अपनी यह कह कर चाँटा दे मारा
वह बोला कस्टम वालों की जब रेड पड़ेगी तेरे घर
सब ठाठ पड़ा रह जाएगा जब लाद चलेगा बंजारा

 

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