अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

डॉ. रमा शुक्ला


 

  हास्य कवियों से

हास्य कवियों ने हमेशा पत्नी की,
खिल्ली उड़ाई है और, प्रेयसी ऊँची उठाई है।

प्रेयसी की आँखों से छलकाई है हाला,
पत्नी की आँखों में भड़काई है ज्वाला।

प्रेयसी की चाल गजगामिनी सी बताई है,
पत्नी में उन्हें मोटी भैंस नज़र आई है।

आज कवि मंच से एक पत्नी ने ललकारा है,
कवि मित्रों को आवाज़ देकर पुकारा है,

हो सके तो बोल कर बतला दें ,
न हो तो हाव भाव से जतला दें,

खुद न कह सकें, किसी और से कहला दें,
कि कितनी बार उनकी पत्नी ने उन्हें
बेलन या डंडे से मारा है ।
 

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter