अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

प्रतिमा वर्मा

 

 

धुँधले परिदृश्य

व्यर्थ रहा आँखों पर फेरना रूमाल
धुँधले ही बने रहे सारे परिदृश्य!

दृष्टिबोध बिकने के सारे बयनामे
बंद किस तिजोरी में कैसे पहचाने!
छीन गये सूरज जो जाने थे कौन हाथ
चुभती हैं पाँवों को किरनें अदृश्य!

चलो एक दो पल को लेते हैं मान
धुएँ की लकीर यज्ञ की भी पहचान!
किन्तु यज्ञ कैसा यह समझाना तुम
बना रहे जैसा ही मुझको भविष्य!

अक्सर वह गुज़रा है दे कंधे थाप
खोजता फिरा हूँ उन कदमों के चाप!
भटकाया मुझको या स्वयं कहीं दूर
जा भटका अपना नि:संगी भविष्य!

किरनों को निगल गयी शोर भरी शाम
चाँद का उदास ख़त कोहरों के नाम!
अपने इस धूल गर्द के पड़ाव से
ढूँढ़ता नहीं हूँ मैं कोई सादृश्य!

 

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter