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तेजराम शर्मा

  उसने चुना

बीहड़ जंगल के मध्य
उस महिला ने चुने दो-चार खेत
दो-चार पशु
एक कमरे का घर के बाहर
छोटे बरामदे में
सारे मौसमों के विरुद्ध
चुना केवल अपने आप को

भय को उसने
समाज के लिए
देवी देवताओं की तरह
दूर बस्ती में छोड़ दिया था

गरमी में उसने पसीने को चुना
बरसात में बिजली को
चमकहीन और ध्वनिहीन कर
गीलापन चुना अपने लिए
शरद की चाँदनी में
चुना बीते सपनों को
शिशिर में बीजों को चुना

हेमंत की रातों में
घर का आसपास
ताज़ा बर्फ़ पर हिंस्र चिह्नों के बीच
चुना चूल्हे के ताप को

बसंत में
ब्रह्मांड भर में
उसने अकेले फूल को चुना
और बालों में खोंस लिया।

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