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कविता वाचक्नवी

जन्म - 6 फरवरी, 1963 (अमृतसर)
शिक्षा - एम.ए. हिंदी (भाषा एवं साहित्य), प्रभाकर (हिंदी साहित्य एवं भाषा), एम.फिल. (स्वर्ण पदक) – पी-एच.डी.  शास्त्री - संस्कृत साहित्य। पंजाबी (मातृभाषा), हिंदी, संस्कृत, मराठी, अंग्रेज़ी, नॉर्वेजियन।

प्रकाशन –  ''महर्षि दयानंद और उनकी योगनिष्ठा'' शोध पुस्तक तथा ''मैं चल तो दूँ' कविता संग्रह प्रकाशित। स्त्री सशक्तीकरण के विविध आयाम तथा दक्षिण भारत कान्यकुब्ज सभा स्मारिका का संपादन। विभिन्न विधाओं में अनेक रचनाएँ देश भर की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित,  कुछ रचनाएँ संकलनों तथा विभिन्न पाठ्यक्रमों में सम्मिलित। अनेक पुरस्कारों से सम्मानित। देश विदेश में जीवन मूल्यों तथा साहित्य से संबंधित अनेक कार्यों में सक्रिय भागीदारी। अध्यापन तथा पत्रकारिता में भी रुचि।

संप्रति - संस्थापक महासचिव – 'विश्‍वंभरा' – भारतीय जीवनमूल्यों के प्रसार की संकल्पना (संस्था), कार्यदर्शी (मंत्री) – स्त्री समाज, अंतर्राष्ट्रीय वेद प्रतिष्ठान न्यास, केंद्रीय विद्यालय मैनेजमेंट कमेटी (एयरफ़ोर्स स्टेशन) में संस्कृतिविद के रूप में मनोनीत।

ईमेल :
kvachaknavee@yahoo.com

 

घर : दस भावचित्र

1
ये बया के घोंसले हैं,
नीड़ हैं
घर हैं-  हमारे
जगमगाते भर दिखें
सो
टोहती हैं
केंचुओं की मिट्टियाँ
हम।

 2
आज मेरी
बाँह में
घर आ गया है
किलक कर,
रह रहे
फ़ुटपाथ पर ही
एक
नीली छत तले।

3
चिटखती उन लकड़ियों की
गंध की
रोटी मिले
दूर से
घर
लौटने को
हुलसता है मन बहुत।

4
सपना था
काँच का
टूट गया झन्नाकर
घर,
किरचें हैं
आँखों में
औ’
नींद नहीं आती।

5
जब
विवशता हो गए
संबंध
तो फिर
घर कहाँ,
साँस पर
लगने लगे
प्रतिबंध
तो फिर
घर कहाँ?

6
अंतर्मन की
झील किनारे
घर रोपा था,
आँखों में
अवशेष लिए
फिरतीं लहरें।

7
लहर-लहर पर
डोल रहा
पर
खेल रहा है
अपना घर,
बादल!
मत गरजो बरसो
चट्टानों से
लगता है डर।

8
घर रचाया था
हथेली पर
किसी ने
उँगलियों से,
आँसुओं से धुल
मेहंदियाँ
धूप में
फीकी हुईं।

9
नीड़ वह
मन-मन रमा जो
नोंच कर
छितरा दिया
तुमने स्वयं
विवश हूँ
उड़ जाऊँ बस
प्रिय! रास्ता दूजा नहीं।

10
साँसों की आवाजाही में
महक-सा
अपना घर
वार दिया मैंने
तुम्हारी
प्राणवाही
उड़ानों पर।

9 जुलाई 2007

 

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