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याद

यादों की
बरफी बनाई
चख के देखी
मीठी थी
बेच ली
1

अंशुमान अवस्थी

स्वागत

तुम्हारा स्वागत है
मेरे एकाकी जीवन में
आओ हम तुम मिलकर
एक ऐसा गीत गाएँ
जिसमें मिलन का बोध हो

और फिर

शब्द झरे तो बह चले
बह चला समय
न तो शब्द थमे
न समय
और न ही नियति
1

प्रश्नचिन्ह

हमने
आपके चेहरे से
प्रश्नचिन्ह हटाए नहीं
शायद इसीलिए
आप मुस्रकुराए नहीं

गिनती

एक दिन, एक सूरज
एक रात, एक चाँद
एक मैं और
सैंकड़ों तनहाइयाँ

ख़बर

जनवरी १०...
उस आदमी को
जिसे एक कुत्ते ने काट लिया था
नगरपालिका वाले पकड़ ले गए
और बधिया कर दिया
1

तुम

तुम आए धूमकेतु की तरह
और चले गए
यादों के जंगल में
अब तो बस
तुम एक जुगनू की तरह

कैसे

मैं नहीं समझ पाता
कि कोई कैसे निकल जाता है
ज़िंदगी की जद्दोजहद से
जीते जी

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