अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

डॉ. चंद्र प्रकाश वर्मा के मुक्तक

 

  मुक्तक

चाँद किरणें कमंद फेंक रहा
एक मुस्कान मंद फेंक रहा
बीन लो चांदनी के आँचल में
चाँद छंदों के बंद फेंक रहा

ये संदेशा बहार लाती है
युग नहीं पल का प्यार लाती है
फूल मुरझा के कली से बोला
इन बहारों पे हँसी आती है

प्यार कंगन नहीं चितवन में है
प्यार नूपुर नहीं रुनझुन में है
प्यार वाणी नहीं संकेतों में
प्यार अलि में नहीं गुंजन में है

प्यार सावन नहीं आँगन में है
बिजलियों बूँद के नर्तन में है
प्यार नभ में नहीं घनमाला में
प्यार जल में नहीं कंपन में है

प्यार साँसें नहीं सिहरन में है
प्यार अनुभूति के अर्चन में है
मुक्ति का अर्थ कहीं बँधना हो
प्यार की मुक्ति तो बंधन में है

१७ नवंबर २००८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter