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लाखनसिंह भदौरिया सौमित्र

 

 

  मुक्तक

एक

धूप जैसे गन्ध में, आकर नहाये।
रूप जैसे छन्द में, आकर नहाये।
नाद लय में याद यों डूबी हुई-
पीर के आनन्द में, गाकर नहाये।

दो

दो दिगन्तों का मिलन ही ब्याह है।
दो बसन्तों का मिलन ही ब्याह है।
दो वियोगों का मिलन परिणय मधुर-
दो अनन्तों का मिलन ही ब्याह है।

तीन

प्राण तुम फिर, एक दृष्टि निहार दो।
मौन के घट से अमिय की धार दो।
तुम लजाती प्रीति की मुस्कान से ही-
जिन्दगी की सब थकान उतार दो।

चार

एक क्षण दे दो किसी को, मुस्कुरा दो।
इस तरह से आग का पीना सिखा दो।
ज़िंदगी मुस्कान से सूनी नहीं हो
इस तरह हमको ज़रा जीना सिखा दो।

९ दिसंबर २०१३

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