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कार्यशाला-११
नवगीत का पाठशाला में पिछले माह आयोजित की गई- ग्यारहवीं कार्यशाला, जिसका विषय था
'मन की महक'। कार्यशाला में नये पुराने रचनाकारों की १५ रचनाएँ प्रकाशित की गईं। चुनी
हुई १० रचनाएँ यहाँ प्रस्तुत हैं-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

१- महका महका आँचल

मेहंदी-सुर्खी
काजल लिखना
महका-महका
आँचल लिखना!

धूप-धूप
रिश्तों के जंगल
खत्म नहीं होते हैं
मरुथल

जलते मन पर
बादल लिखना!

इंतज़ार के
बिखरे काँटे
काटे नहीं कटे
सन्नाटे

वंशी लिखना
मादल लिखना!

-- डॉ. हरीश निगम

३- मन रे, तू खुलकर सच बोल

इस झूठी
नीरस दुनिया में
कुछ सच का रस घोल
मन रे
तू खुलकर सच बोल

तू हारा
मानव हारा है
तू जीता तो यह जीता है
तेरे दम से
जीवन का हर
विष अमृत करके पीता है
तू चाहे
इतिहास बदल दे
तू चाहे भूगोल

मन में हो
यदि महक सत्य की
तन भी खिला-खिला रहता है
जीवन के
हर रंग-ढंग में
खुलकर घुला-मिला रहता है
ऐसी मीठी
महक दसों दिसि
के समीर में घोल

-- डॉ. त्रिमोहन तरल


५- मन-अँगना में

मन-अँगना में चंदन सुरभि
केसर अंग झरे
जूही-चंपा सखी-सहेली
कुंकुम माँग भरे
सजधज निकली सोन गुजरिया
रूप-गंध बिखरे

ताल-तलैया पनघट-पोखर
गुपचुप बात हुई
गीतों की लड़ियों को बुनते
आधी रात हुई
अधरों पे थे लाज के पहरे
चितवन बात करे

सतरंग चुनरी उड़-उड़ जाए
मनवा बाँध न पाए
अंबर छूती आशाओं के
सपने नैन समाए
भरी गगरिया छल-छल छलके
रुनझुन पाँव धरे

--शशि पाधा
 

७- क्वाँर की हुई अवाई

मेघ छटे
नभ नीला-नीला हुआ
क्वाँर की हुई अवाई
राम-राम कर
कीचड़, पानी और
छतरी से छुट्टी पाई

ज्वाँर लगे खेतों में
दद्दा लगे घूमने
देख-देखकर धान
पिताजी ख़ुश हो जाते
तोड़-तोड़कर लाते भुट्टे
रोज़ भूनते,
पुरा पड़ोसवालों को
भरपेट खिलाते
अम्मा कहतीं सुनो-सुनो जी
बिना देर के,
देव उठनी के बाद
'शशि' की करो सगाई

दिखती सोयाबीन
चमकती सोने जैसी,
कैसी-कैसी बात
महकती रहती मन में
भौजी कहतीं मैं लूँगी
चाँदी की पायल
भैया सपने लेकर
उड़ते नीलगगन में
दद्दा बोले, हँसिया लेकर
चलो खेत में
मिल-जुलकर सब करें
धान की शुरू कटाई|

मझले कक्का जाते
हरदिन सुबह बगीचे,
काकी लिए कलेवा
पीछे-पीछे जातीं
छोटे कक्का अब तक
बिन ब्याहे बैठे हैं
मझली काकी हँसते-हँसते
उन्हें चिढ़ातीं
दद्दा के माथे पर
चिंता की रेखाएँ,
नहीं कहीं से बात
अभी रिश्ते की आई

--प्रभु दयाल श्रीवास्तव

९- मन में फिर आनंद समाया

तुम आए तो जीवन आया
मन में फिर आनंद समाया

गीत रचाया हमने पूरा
लेकिन लगता हमें अधूरा
तुम आए तो सावन आया
शब्दों में फिर बंद समाया
मन में फिर आनंद समाया

मन की क्यारी महक रही थी
साँस हमारी चहक रही थी
आकर तुमने गले लगाया
सुंदर सुर में छंद सुनाया
मन में फिर आनंद समाया


-- डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक

११- महका मन

बहुत दिन के बाद
महका मन

सिलबटें कम की समय ने
एक ठंडक पी
लहलहाने लगा उर का
विपिन दंडक भी
मुदित चिड़ियों-सा
प्रकृति के साथ
चहका मन

मिल गई पर्यावरण को
शुद्ध आक्सीजन
इस तरह से कुछ हुआ
ॠतु-चक्र परिवर्तन
डूबकर स्वप्निल
सुरा-सरि आज
बहका मन

-- पं. गिरिमोहन गुरु


कार्यशाला-११
२२ नवंबर २०१०

 

२- महका-महका

महका-महका
मन-मंदिर रख सुगढ़-सलौना
चहका-चहका

आशाओं के मेघ न बरसे
कोशिश तरसे
फटी बिमाई, मैली धोती
निकली घर से
बासन माँजे, कपड़े धोए
काँख-काँखकर
समझ न आए पर-सुख से
हरसे या तरसे
दहका-दहका
बुझा हौसलों का अंगारा
लहका-लहका

एक महल, सौ यहाँ झोपड़ी
कौन बनाए
ऊँच-नीच यह, कहो खोपड़ी
कौन बताए
मेहनत भूखी, चमड़ी सूखी
आँखें चमकें
कहाँ जाएगी मंजिल
सपने हों न पराए
बहका-बहका
सम्हल गया पग, बढ़ा राह पर
ठिठका-ठहका

-- संजीव सलिल

 

४- क्वाँर की इस साँझ

ले रही है नाम
नूपुर-झाँझ प्रीतम-मीत का!
गा रही है गीत अब गोधूलि
सोनल प्रीत का!

क्वाँर की इस साँझ
साजन ने
न जाने कह दिया क्या
मधुर उसके कान में!

छुअन को महका रहा है
सरस झोंका प्यार-सा
मधु-सीत का!

फिर रही सजनी पुलक
घर-आँगने
मोहिनी मुस्कान मन-भर
सज नए परिधान में!

चल पड़ा है सिलसिला अब
हर नवेली रात में
नव-रीत का!

--रावेंद्रकुमार रवि

 

६- मन मेरा भी महक उठा

घर ख़ुशियों से चहक उठा
मन मेरा भी महक उठा

सूरज ने जब डाले पर्दे
धूप न जाने कहाँ चली
बाँधे गाँठ
हवाओं के सँग
मौसम महके गली-गली

बदली ऋतु तो
कण-कण में सुख
हौले-हौले चहक उठा
मन मेरा भी महक उठा


किरण खिली गदराए पेड़
वन में खग-मृग आतुर विचरे
आँचल पर
आकाशी तारे
ज़रदोज़ी से निखरे-निखरे

कुसमित पवन
सजाए दीपक
नभ में चंदा दमक उठा
मन मेरा भी महक उठा

--रचना श्रीवास्तव

 

८- है हरसिंगार-सी रात

यह भोर हुई
शबनम-शबनम
दिन-रैन
बहुत गुलपोश लगे

हंसते नित
सनई-पाट सजन
है हरसिंगार-सी
रात सजन
गमगम करते
जज्बात सजन
हरबात बहुत
मदहोश लगे

कुछ दूर गई
बरखा-बदरी
हुलसे यह देख
नयन कजरी
अब साँझ-सबेरे
दोपहरी, हरदम
तेरा आगोश लगे

--शंभु शरण मंडल

 

१०- महक उठें मन

चलो ढूँढ वो लाएँ चंदन
जिससे महक उठें मन

कब थे ऐसे फटे-हाल मन
अंतर्मन थे उपवन
पल-पल की ये भाग-दौड़ ही
रही भुलाए बचपन
मन के बिन कब पुष्प खिलेंगे
बंजर होंगे तन-मन
चलो ले आएँ वो स्पंदन
जिससे चहक उठें मन

प्रीत के बिरवे बोकर मन की
फसलें स्वयं उगानी
सूखे मन में नेह-नीर भर
कविता कोइ जगानी
मौन अधर रख आएँ बंसी
हर मन कहे कहानी
चलो ले आएँ वो अपनापन
जससे महक उठें मन

हम हैं बूँदें एक सिंधु की
पलक झपकते मिटतीं
हैं अनमोल खजाने मन क्यूँ
श्वास अटकते दिखतीं
खिले पंक में भी पंकज मन
यही सीख अपनानी
चलो ले आएँ नेह बंधन
जिससे बहक उठें मन

--गीता पंडित

१२- मन की महक मिलाएँ

भारत माँ का घर जर्जर है
सब मिल पुनः बनाएँ
सेवा के कुछ फूलों में
हम मन की महक मिलाएँ

बेघर करके बेचारों को
बीत रही बरसात
दबे पाँव जाड़ा आता है
करने उनपर घात
कम से कम हम एक ईंट इक वस्त्र उन्हें दे आएँ
हुए अधमरे अधनंगे जो उनके प्राण बचाएँ

मंदिर मस्जिद जो भी टूटा
टूटीं भारत माँ ही
चाहे जिसका सर फूटा हो
रोई तो ममता ही
मंदिर एक हाथ से दूजे से मस्जिद बनवाएँ
अब तक लहू बहाया हमने अब मिल स्वेद बहाएँ

--धर्मेंद्रकुमार सिंह सज्जन

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