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बड़भागी अशोक
 

ओ अशोक
तुम बड़भागी
स्वीकार करो जगती-वन्दन।

जनक दुलारी के दुख को
निर्मल शाखों से
सहलाया
धीर बँधा अबला मन को
सारे कष्टों को
दुलराया

ओ अशोक
सिय-दुखभागी
यश गाते तेरा रघुनंदन।

जीत गये त्रेता युग में
द्वापर में चीर-
हरण भोगा
क्या ऐसा भी सोचा था
मूल्यों का नित्य-
क्षरण होगा

ओ अशोक
रह हतभागी
सुनना है तुमको युग-क्रन्दन।

दिन-पर -दिन
बढ़ रहा तमस
मानवता रह-रह अकुलाती
बोधहीन जीते जाते
चिर ज्ञान पिपासा रह जाती

ओ अशोक
पथ- सहभागी
शान्त करो व्याकुल-जन-मन।

- भावना तिवारी 

१ अगस्त २०१८

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