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बूढ़ा हुआ अशोक
 

बरसों से जो खड़ा हुआ था
बूढ़ा हुआ अशोक

हरी भरी शाखों पर इसकी
खिले हुए थे फूल
लेकिन मन के हर पत्ते पर
जमी हुई थी धूल
आँख समय की धुँधली हो गई
फिर भी ना कोई शोक

मौसम की हर तपिश सही है
फिर भी शीतल छाँव
जो भी द्वारे उसके आया
लुटा नेह का गॉँव
बारिश आंधी लाख सताए
पर झरता आलोक

आज शिराओं में बहता है
पानी जैसा खून
अब शाखों को नोच रहें हैं
अपनों के नाखून
बूढ़े बाबा की धड़कन में
ये ही अपना लोक

बरसों से जो खड़ा हुआ था
बूढ़ा हुआ अशोक

- शशि पुरवार  

१ अगस्त २०१८

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