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देवदारु: दस क्षणिकाएँ
 

१
देना सीखें
बिना कुछ लिए
आओ
देवदारु-सा जिएँ!

२
देवदारु के पेड़
क्या-क्या
बाँटते रहे
और हम
जड़ें काटते रहे!

३
देवदारु के
पौराणिक सन्दर्भ
तो गिनाते रहे
किन्तु
धरती से
स्वर्ग मिटाते रहे!

४
उधर
शीश ताने खड़े
देवदारु
दहक रहे हैं
इधर हम
रुपयों की खनक से
चहक रहे हैं!

५
अभी वक़्त है
जन-जन को
समझाना होगा
सुनहरे कल के लिए
देवदारु
बचाना होगा!

६
जब
दानवता
आकाश छू रही है
देवदार
उठें और कितने ऊँचे
मही पूछ रही है!

७
सुविधाभोगी मानव
जब आरा चलाता है
देवदारु
अपने होने पर
बहुत पछताता है!

८
अहंकार में
नहीं
फूलते हैं
देवदारु
आसमान चूमते हैं!

९
देवदारु
मानवता का
पाठ पढ़ाते हैं
मौन होकर भी
इंसानों को
सिखाते हैं!

१०
देवदारु
खड़े रहे अटल
निर्लिप्त भाव-से
और हम
काटते रहे
उनकी बाँहें
दुर्भाव-से!

- डॉ. शैलेश गुप्त 'वीर'   
 
१५ मई २०
१६

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