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कचनार- तीन मुक्तक





 
एक

दिल तुम्हारा था हमारी देह में
और अपना था तुम्हारे नेह में
बात उपमा की चली तो क्या बताएँ
हर तरफ़ चर्चा हुई कचनार की

दो

जब दुखों की धूप ने सोखा बदन
और उसको छू गई तपती पवन
आ गईँ लेकर तुम्हारी भावनाएँ
लहलहाती डालियाँ कचनार की

तीन

कब न जाने कौन क्या कुछ कह गया
प्रेम का धागा उलझ कर रह गया
गुत्थियाँ खोलें तुम्हारी कामनाएँ
औषधि का रूप ले कचनार की

पवन चंदन
१६ जून २००८

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