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वेणी कचनार की





 

झुकी कहीं फूलवती वेणी कचनार की
चौतरफ़ा फैल गई गंध नमस्कार की

आँगन-सा लीप गई
चंचल आकृतियाँ
मौसम ने अँजुरी भर
सौंपीं स्वीकृतियाँ
अपनापन घोल गई संध्या शनिवार की

छू-छू संजीवनी
हवाओं के झोंके
सोते से जगा गए
गीत धमनियों के
तन्द्रा-सी टूट गई अनबोले तार की

रमेश रंजक
१६ जून २००८

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