अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

चाहती तो हूँ

 
कमल के पत्ते पर
ओस की बूँद है तू,
सुबह की नींद से तल्लीन
मुझे बुलाती हुई।

दिल पर एक चाबुक-सा पड़ता है,
जब तुझे छोड़कर जाती हूँ।

तेरे घाव पर
रुई का फाहा बन जाना
चाहती हूँ मैं,
कि एक और जहान तुझे
कहीं से ला दूँ।
काश, हड़बड़ी न होती
दफ्तर न होते, होते हम कोई और,
कमल ताल में
पत्तों में छिपकर आँख मिचौनी खेलते।।
मैं ढूँढती तुझे पाती
तू ढ़ूँढ़ती, मुझे,
पहाड़ों के ऊपर से,
नीलाँचल में बसा
वो गाँव दिखाती
जहाँ से, प्यार आता है।

यह होम-वर्क तू क्या ले बैठती है हर समय,
हमें समय रहते कहीं भाग चलना है
साँची के स्तूप पर
या सागर किनारे की दोपहर में
जहाँ लहरें गाती हैं अनवरत संगीत

तू क्या करती है ये सवाल-जवाब? चलो वहाँ
जहाँ सारे जवाब सामने होते हैं, हमें महज़
ताड़पात्रों में अटके प्रश्न उतार लेने होंगे।

-- --इंदिरा मिश्र
२१ जून २०१०

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter