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नील कुवलय-से नयन

 
नील कुवलय -से
तुम्हारे
अधमुँदे ये नयन
पावन कितने
बुनते सपन।

डूबे मदिर
कल्पना के रंग में
और गहरी झील -सा
अपना यह मन।

भोर की स्वर्ण किरने
लगी मुख चूमने,
आज फिर भी
ये नयन हैं अनमने।

लहर -सुधियाँ
कई जन्मों से जुड़ी
रूप का कर रही
अनवरत आचमन।

फिर जनम
मिला हमें
तो फिर मिलेंगे ,
अधखिले ये कमल
फिर-फिर खिलेंगे।

भूल नहीं पाया
अभी तक
उर यह आकुल
मृदु स्पर्श
तरल स्मित की चितवन।

--रामेश्वर कांबोज हिमांशु
२१ जून २०१०

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