अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

स्वागत करे कनेर
 
वर्षा आती देख कर, स्वागत करे कनेर।
पूर्व संदेशा दे गया, बैठा काक मुँडेर।।

तरु कनेर आँगन खड़ा, मुझको रहा बताय।
खुशबू से सत्कर्म की, जीवन लो महकाय।।

सुर नर सबके मन बसा, मैं भोली अनजान।
पुहुप कनेर रख धूल में खेल रही दिनमान ।।

मन वासन्ती हो गया, खिलता देख कनेर।
विपदाएँ विस्मृत हुईं, मेरी शाम सवेर ।।

कितनी यादें हैं जुड़ीं, इस कनेर के संग।
इसकी छाया में मिले, जीवन के सब रंग ।।

प्रमुदित मन मधु बाँटता, सबको अपना मान।
तितली भँवरे बुलबुलें, सभी करें मधुपान ।।

पीत वरन कुसुमन विविध, गेंदा ढाक बबूल।
पर भोले के मन चढ़ें, ये कनेर के फूल ।।

- धमयंत्र चौहान
१६ जून २०१४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter