अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

कनेर के फूल
 
छटा बिखेरते हैं मेज़ पर
गुलाब के फूल
दिलो निगाह करें ताज़ा तर
कनेर के फूल

हर एक मिज़ाज के मौसम का
क़हर सहते हुए
खिला ही करते हैं
वक़्त ए सहर कनेर के फूल

सदाबहार हैं
इनको नज़र नहीं लगती
असर ख़िज़ाँ का करें बेअसर
कनेर के फूल

ज़मीं भिगोती रही
इन से ओस छन छन के
महक लुटाते रहे रात भर
कनेर के फूल

हक़ीम की हो वो तिब,
वैद्य की हो आयुर्वेद
कई मर्ज़ की दवा कारगर
कनेर के फूल

वो लाल भी हैं
गुलाबी सफ़ेद पीले भी
हर एक रंग में नूर ए नज़र
कनेर के फूल

उभार देते हैं
पाकीज़गी का एक एहसास
रहेंगे साथ 'सिया' उम्र भर
कनेर के फूल

- सिया सचदेव
१६ जून २०१४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter