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डाल डाल पर
 
डाल-डाल पर कनहल की,
बूँद-बूँद बदली झलकी।

फूल-फूल पर भौंरे गाते,
झुंड बनाकर बच्चे आते,
मौसम भी लगता अति प्यारा,
कनहल से जब साजे द्वारा॥

याद बसी है बचपन की,
डाल-डाल पर कनहल की।

पीले-पीले रंगीले-से,
घनी पत्तियों में ढीले-से,
पंखुडियों में स्वर्ण समाया,
हरियाली से जग सरसाया

खुशी मिल गई ज्यों मन की,
डाल-डाल पर कनहल की।

देख-देख कनहल के पादप,
पास नहीं आता है आतप,
हरित पर्ण हैं, पीत सुमन हैं,
बगिया के ये मनभावन हैं।

खिले खुशी में सावन की,
डाल-डाल पर कनहल की ।

- पवन प्रताप सिंह 'पवन'
१६ जून २०१४

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