अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

कुड़ची फूल

 

गहरे-छितरे स्तबक से, झाँकें जुगनू झूल
चारु चंचला चंद्रिका, जैसे 'कुड़ची' फूल

अपराजित संघर्ष का, मानों एक प्रतीक
नाम-गुणों अनुरूप है, वन का वृक्ष सटीक

छाँव नहीं देता भले, यह औषधि भंडार
'कुटज' भगाये दूर पर, जूड़ी ज्वर अतिसार

मीठा बनता रोग जब, कड़वा बने हकीम
आम खुबानी से भले, 'कुटज' करेला नीम

जिजीविषा रखकर अटल, 'कुटज' जिये बिंदास
शायद मनु से सीख यह, पाता जीवन-ग्रास

बाहर कम भीतर अधिक, बूझें कैसे हाल
'रीत' हृदय औ 'कुटज' की, जड़ें बसें पाताल

- परमजीत कौर 'रीत  
१ जुलाई २०१९

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter