अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

पादप एक महज हूँ

 

चट्टानों को फाड़ निकलता
पादप एक महज हूँ
रस लेकर पाताल लोक से
जीता सदा कुटज हूँ

शुष्क भूमि पथरीली नीरस
खड़ा अकेला निर्जन में
मुझको है विश्वास सदा ही
अपने किये परिश्रम में

लोग अपरिचित प्रश्न करें जब
कहता सरल सहज हूँ

वासंती मौसम में खिलते
गुच्छों में जब श्वेत सुमन
इन्द्र जवा का रूप देखकर
स्वयं धरा का हर्षित मन

अपने ही दमखम पर पलता
करता नहीं अरज हूँ

कविकुल से मैं रहा उपेक्षित
कभी नहीं फरियाद किया
कालिदास ने मेघदूत में
पर मुझको है याद किया

विलग भाव से रहता हरदम
धरती का धीरज हूँ

- श्रीधर आचार्य शील  
१ जुलाई २०१९

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter