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साधु सरीखा नीम
 

 

मानव जीवन से जुडा, जब उपयोगी नीम।
लोग उसे सम्मान से, कहने लगे हकीम।।

लकड़ी, पत्ते, छाल, जड़, फल का भी उपयोग।
सखा मिले यदि नीम सा, क्यों न सराहें लोग।।

रक्तदोष, ज्वर, कोढ़, व्रण, नेत्र-रोग, नासूर।
सेवन हो यदि नीम का, हो जाते हैं दूर।।

कितनी ही बीमारियाँ, बिना दाम हों ठीक।
ऐसी कोशिश कीजिये, नीम रहे नजदीक।।

जितना कड़वा स्वाद में, उतना गुण की खान।
साधु सरीखे नीम को, आओ दें सम्मान।

-त्रिलोक सिंह ठकुरेला
२० मई २०
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