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प्रज्वलित है पलाश   

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प्रज्ज्वलित है पलाश आज
फिर से उठी है उमस
अलसाई सी घास
निर्निमेष निहारती
अरुण पुष्पों के कटाव
पलाश का हर उतार-चढाव
कच्चे कोपलों की अग्नि में
ज्यों निष्ठुर का तप्त छल
और हर अन्तर का पराग ज्यों
प्रिय का चिर अनुराग
प्रज्ज्वलित है पलाश आज

- स्वाती भालोटिया
२० जून २०११

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