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          खिले फूल रजनीगंधा के

 

 

भीनी-भीनी मधु सुगन्ध ले
मन के आँगन में चुपके से
खिले फूल रजनीगंधा के

शुभ्र-श्वेत वसनों में लिपटे
कुछ सकुचाते कुछ सिमटे से
झाँक रहे थे चुपके-चुपके
श्वेत फूल रजनीगंधा के

स्पर्श मृदुल रवि किरणों का
पाकर मुसकाई कली-कली
सुरभित मन के हर कोने में
हँसे फूल रजनीगंधा के

मैं तो बस इतना ही जानूँ
खिल-खिल हँसते शाम-सबेरे
अँगनाई में मेरे मन के
खिले फूल रजनीगंधा के

- कुन्तल श्रीवास्तव
१ सितंबर २०२१

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